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शहीदों की यादों पर अंधेरा,बलरामपुर का एकमात्र शहीद पार्क बदहाली का शिकार

“जब शहीदों की स्मृति स्थल ही सुरक्षित और रोशन नहीं रह पाएंगे, तो आने वाली पीढ़ी देशभक्ति कैसे सीखेगी?

बलरामपुर,छत्तीसगढ़ के बलरामपुर जिले में स्थित एकमात्र शहीद पार्क, जो देश के लिए अपने प्राण न्योछावर करने वाले वीर सपूतों की स्मृति में बनाया गया था, आज उपेक्षा और बदहाली का प्रतीक बनता जा रहा है। यह वही स्थान है, जिसे पूर्ववर्ती सरकार की मंशा के तहत इसलिए विकसित किया गया था ताकि जिले के शहीद जवानों को सम्मान मिले, आने वाली पीढ़ियां उनके बलिदान को जानें और लोग यहां आकर कुछ पल सुकून व श्रद्धा के साथ बिता सकें।

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        क्यों बनाया गया था शहीद पार्क?

शहीद पार्क का उद्देश्य केवल एक उद्यान बनाना नहीं था, बल्कि देश के लिए बलिदान देने वाले शहीद जवानों को स्थायी सम्मान देना युवाओं में देशभक्ति की भावना जागृत करना शहीदों के नाम और उनके योगदान को जन-जन तक पहुँचाना परिवारों के लिए एक शांत, प्रेरणादायक और स्मरण स्थल उपलब्ध कराना इसी सोच के साथ करीब 30 से 40 लाख रुपये की लागत से इस पार्क का निर्माण कराया गया था। तत्कालीन सरकार द्वारा इसका विधिवत अनावरण भी किया गया था। शुरुआत में थी रौनक निर्माण के बाद शहीद पार्क को हरे-भरे पेड़-पौधों, रंग-बिरंगी लाइटों और आकर्षक साज-सज्जा से सजाया गया था।शाम के समय यहां की रौशनी और माहौल लोगों को खूब आकर्षित करता था।परिवार, बच्चे, बुजुर्ग सभी बड़ी संख्या में यहां आते थे, शहीदों को नमन करते थे और कुछ पल शांति से बिताते थे।

             अब बदहाली की तस्वीर

समय के साथ यह शहीद पार्क दुर्भाग्य और दुर्दशा का शिकार हो गया हैसभी लाइटें बंद पड़ी हैं, शाम होते ही पार्क अंधेरे में डूब जाता है अंधेरे के कारण सांप-बिच्छुओं का डर लोगों को यहां आने से रोक रहा है जगह-जगह कचरा फैला हुआ है रंगीन रौशनी और आकर्षण पूरी तरह गायब हो चुका है शाम के समय यह पार्क खंडहर जैसा दृश्य प्रस्तुत करता है दिन में किसी तरह पार्क दिखाई देता है, लेकिन सूर्य ढलते ही यह वीरान हो जाता है।

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                 जिम्मेदार है कौन?

यह पार्क जिला मुख्यालय में स्थित है और नगरपालिका क्षेत्र के अंतर्गत आता है।हैरानी की बात यह है कि संबंधित विभाग और जिम्मेदार अधिकारी रोज़ इसी मार्ग से आते-जाते हैं फिर भी किसी का ध्यान शहीद पार्क की ओर नहीं जातारखरखाव की जिम्मेदारी निभाने वाला विभाग या तो यहां आता ही नहीं, या फिर नजरअंदाज कर लौट जाता है.

           शहीदों के सम्मान पर सवाल

जिस पार्क को शहीद जवानों की यादों को संजोने के लिए बनाया गया था, वही आज उपेक्षा का शिकार है।ऐसा प्रतीत होता है कि शहीदों को याद करने और देखने अब केवल आम  लोग ही पहुंचते हैं,

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स्थानीय लोगों में इस स्थिति को लेकर गहरी नाराजगी और दुख है।अब लोग का कह रहे हैं कि अगर शहीदों की स्मृति स्थल ही सुरक्षित और सुसज्जित नहीं रह पाएंगे, तो आने वाली पीढ़ी को हम क्या संदेश देंगे?”जरूरत है तत्काल कार्रवाई की शहीद पार्क की गरिमा बनाए रखने के लिए बंद पड़ी लाइटों को तत्काल चालू किया जाए नियमित सफाई और रखरखाव सुनिश्चित किया जाए सुरक्षा के उचित इंतजाम किए जाएं शहीदों की जानकारी को प्रदर्शित करने वाले बोर्डों को सहेजा जाए.शहीद पार्क केवल एक पार्क नहीं, बल्कि बलिदान, सम्मान और राष्ट्रभक्ति का प्रतीक है।यदि आज हम इसे यूँ ही अंधेरे और उपेक्षा में छोड़ देंगे, तो यह शहीदों के बलिदान के साथ अन्याय होगा।अब देखने वाली बात यह है कि जिम्मेदार विभाग कब जागता है और बलरामपुर के इस एकमात्र शहीद पार्क को उसकी खोई हुई पहचान और गरिमा कब लौटाई जाती है।

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Vijay Singh

विजय सिंह, समीक्षा न्यूज़ के मुख्य लेखक हैं। एवं वर्षों से निष्पक्ष, सत्य और जनहितकारी पत्रकारिता के लिए समर्पित एक अनुभवी व जिम्मेदार पत्रकार के रूप में कार्यरत हूँ।

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