नाम बदला, ढांचा वही “गौधाम योजना” पर उठे सवाल, गोठान से गौधाम तक, क्या बदला, क्या वही रहा?
छत्तीसगढ़ सरकार का वर्चुअल शुभारंभ, बलरामपुर के देवीगंज में “सुरभि गौधाम” उद्घाटन — विपक्ष का सवाल, पुरानी योजना को नया नाम देकर प्रचार तो नहीं?

छत्तीसगढ़ शासन द्वारा बड़े शोर-शराबे के साथ शुरू की जा रही तथाकथित “गौधाम योजना” का वर्चुअल शुभारंभ किया जा रहा है। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय, मंत्री राम विचार नेताम एवं गौ सेवा आयोग के प्रांत अध्यक्ष विशेश्वर पटेल जी की उपस्थिति में गुरु घासीदास केंद्रीय विश्वविद्यालय, कोनी बिलासपुर से इस योजना का शुभारंभ किया जा रहा है।
इसी क्रम में बलरामपुर जिले के ग्राम देवीगंज, विकासखंड रामचंद्रपुर में “सुरभि गौधाम” का वर्चुअल उद्घाटन विभिन्न जनप्रतिनिधियों और अतिथियों की मौजूदगी में किया जा रहा है। कार्यक्रम में जिला पंचायत अध्यक्ष हिरामुनि निकुंज, गौ सेवा आयोग के जिला अध्यक्ष आशीष केसरी, जिला पंचायत उपाध्यक्ष धीरज सिंह देव, भाजपा जिला महामंत्री भानु दीक्षित सहित अनेक पदाधिकारी और जनप्रतिनिधि उपस्थित रहेंगे।
लेकिन इस पूरे आयोजन के पीछे की सच्चाई को भी जनता समझ रही है।दरअसल, यह कोई नई योजना नहीं है बल्कि पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार द्वारा शुरू की गई “गोठान योजना” को नया नाम, नया बोर्ड और नया प्रचार देने की कोशिश भर है।जिस योजना को पहले कोस-कोस कर बदनाम किया गया, आज उसी के ढांचे पर नई रंगाई-पुताई करके उसे “महत्वाकांक्षी योजना” बताने की कोशिश हो रही है।
सवाल सीधा है —अगर गोठान योजना इतनी ही खराब थी, तो आज उसी मॉडल को नया नाम देकर फिर क्यों शुरू किया जा रहा है?और अगर वह योजना अच्छी थी, तो फिर उसे वर्षों तक राजनीतिक निशाना क्यों बनाया गया?
आज हालात यह हैं कि जहाँ पहले गोठान में पशु, चारा और गतिविधियाँ दिखाई देती थीं, वहाँ अब कई जगह सिर्फ ताले, टूटे शेड और फोटो खिंचवाने की औपचारिकता बची है।
गायों के नाम पर राजनीति करने वाले आज गौ सेवा के बजाय गौ प्रचार में अधिक रुचि दिखा रहे हैं।गाँवों में आवारा पशु सड़कों पर भटक रहे हैं, किसान अपनी फसलों को बचाने के लिए रात-रात भर जाग रहे हैं, लेकिन समाधान के बजाय वर्चुअल उद्घाटन और मंचीय भाषण ही दिखाई दे रहे हैं।
यह भी कम विडंबना नहीं किजमीन पर व्यवस्था कमजोर है और मंच पर तालियाँ मजबूत।
जनता पूछ रही है —क्या गायों की सेवा सिर्फ नए नाम, नए बोर्ड और नए फोटो से हो जाएगी?या फिर वास्तव में ऐसी व्यवस्था बनेगी जिससे गौवंश सुरक्षित हो, किसानों को राहत मिले और ग्रामीण अर्थव्यवस्था मजबूत हो?आज जरूरत दिखावे की नहीं, बल्कि जमीनी काम की है।
अगर सरकार सच में गौ सेवा के लिए गंभीर है तो उसे योजनाओं का नाम बदलने के बजाय उनकी कार्यप्रणाली सुधारने और पारदर्शिता सुनिश्चित करने पर ध्यान देना चाहिए।अन्यथा यह पूरा आयोजन गौ सेवा कम और राजनीतिक पुनःपैकेजिंग अधिक प्रतीत होता है।
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