स्वास्थ्य सेवाओं के निजीकरण के विरोध में आदिवासी समाज का बड़ा प्रदर्शन, सरकार को 15 दिन का अल्टीमेटम
मुख्यमंत्री के नाम सौंपा ज्ञापन, निजीकरण वापस लेने की मांग सरकारी अस्पतालों को मजबूत करने पर दिया जोर

बलरामपुर। छत्तीसगढ़ सर्व आदिवासी समाज ने प्रदेश में शासकीय सुपर स्पेशलिटी अस्पतालों और पैथोलॉजी सेवाओं के प्रस्तावित निजीकरण के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। जिला मुख्यालय बलरामपुर में समाज के पदाधिकारियों ने जिला अध्यक्ष बसंत कुजूर के नेतृत्व में मुख्यमंत्री के नाम जिला प्रशासन को ज्ञापन सौंपते हुए निजीकरण के फैसले को तत्काल वापस लेने की मांग की।
समाज का कहना है कि सरकारी अस्पताल प्रदेश के गरीब, आदिवासी, दलित, पिछड़े और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लोगों के लिए सबसे बड़ा सहारा हैं। यदि स्वास्थ्य सेवाओं को निजी कंपनियों के हवाले किया गया तो इलाज का खर्च बढ़ने के साथ-साथ दूरस्थ और ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों की स्वास्थ्य सुविधाओं तक पहुंच भी प्रभावित होगी। इसलिए सरकार को निजीकरण की बजाय सरकारी अस्पतालों को आधुनिक संसाधनों और पर्याप्त मानवबल से मजबूत करना चाहिए।
ज्ञापन में कहा गया कि प्रदेश के कई सरकारी अस्पताल आज भी डॉक्टरों, विशेषज्ञ चिकित्सकों, लैब टेक्नीशियन, स्टाफ नर्स और आवश्यक उपकरणों की कमी से जूझ रहे हैं। ऐसे में निजी कंपनियों को जिम्मेदारी सौंपने के बजाय रिक्त पदों पर नियमित भर्ती कर अस्पतालों की व्यवस्थाओं को बेहतर बनाया जाए। समाज का तर्क है कि सरकारी संस्थानों को मजबूत किए बिना निजीकरण लागू करना जनहित के विपरीत होगा।
छत्तीसगढ़ सर्व आदिवासी समाज ने यह भी आशंका जताई कि पीपीपी मॉडल के माध्यम से अस्पतालों के संचालन से आरक्षण व्यवस्था और स्थानीय युवाओं के रोजगार के अवसर प्रभावित हो सकते हैं। तृतीय एवं चतुर्थ श्रेणी के पदों पर स्थानीय अनुसूचित जनजाति, अनुसूचित जाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के युवाओं को मिलने वाले रोजगार में कमी आने की संभावना जताई गई है।
समाज ने विशेष रूप से सरगुजा संभाग के बलरामपुर, सूरजपुर, जशपुर, कोरिया और मनेन्द्रगढ़-चिरमिरी-भरतपुर जिलों का उल्लेख करते हुए कहा कि इन क्षेत्रों में पहले से ही स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव है। यदि निजीकरण लागू हुआ तो दूर-दराज के ग्रामीण और आदिवासी इलाकों के मरीजों को बेहतर इलाज मिलने में और अधिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है।
ज्ञापन में सरकार से प्रमुख मांगें रखते हुए कहा गया कि निजीकरण से जुड़े सभी आदेश तत्काल निरस्त किए जाएं, सरकारी अस्पतालों का संचालन पूरी तरह शासन के नियंत्रण में रखा जाए, स्वास्थ्य विभाग में नियमित भर्ती शुरू की जाए, संविदा व्यवस्था को समाप्त कर स्थायी नियुक्तियां की जाएं तथा स्वास्थ्य बजट में वृद्धि कर अस्पतालों में आधुनिक मशीनें और आवश्यक संसाधन उपलब्ध कराए जाएं।
जिला अध्यक्ष बसंत कुजूर ने कहा कि स्वास्थ्य सेवा कोई व्यवसाय नहीं बल्कि जनता का मौलिक अधिकार है। सरकार को ऐसा कोई भी निर्णय लेने से बचना चाहिए जिससे गरीब और जरूरतमंद लोगों के इलाज पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़े। उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज जनहित के इस मुद्दे पर पीछे हटने वाला नहीं है।
समाज ने चेतावनी दी है कि यदि 15 दिनों के भीतर सरकार ने निजीकरण के फैसले पर पुनर्विचार कर सकारात्मक निर्णय नहीं लिया तो पूरे छत्तीसगढ़ में चरणबद्ध आंदोलन शुरू किया जाएगा। आंदोलन के तहत चक्का जाम, कलेक्ट्रेट घेराव, धरना-प्रदर्शन और अन्य लोकतांत्रिक कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे, जिसकी पूरी जिम्मेदारी शासन-प्रशासन की होगी।






