
विजय सिंह@छत्तीसगढ़ का बलरामपुर जिला आदिवासी बहुल क्षेत्र के रूप में जाना जाता है, लेकिन विडंबना यह है कि आज भी यहां का आदिवासी समाज खुद को सुरक्षित महसूस नहीं कर पा रहा है खासकर पहाड़ी कोरवा जनजाति, जिन्हें राष्ट्रपति के दत्तक पुत्रों के रूप में पहचान मिली है, उनके सामने आज भी अपने ही अस्तित्व को बचाने की चुनौती खड़ी है पीढ़ियों से अपनी जमीन पर जीवन यापन करने वाले इन लोगों की जमीनें अब बाहरी लोगों द्वारा लगातार हड़पी जा रही हैं अवैध अतिक्रमण और जबरन कब्जे की घटनाएं थमने का नाम नहीं ले रही हैं चार पीढ़ियों से जिन जमीनों पर पहाड़ी कोरवा परिवारों ने मेहनत कर अपना घर बसाया, अपने बच्चों का पालन पोषण और शिक्षा-दीक्षा का आधार बनाया, आज वही जमीन उनसे छीनी जा रही है
दुख की बात यह है कि कई मामलों में जमीन विवाद कोर्ट में वर्षों से लंबित हैं, लेकिन न्याय की प्रक्रिया इतनी धीमी है कि पीड़ितों को राहत नहीं मिल पा रही बलरामपुर से महज 10 किलोमीटर दूर ग्राम पंचायत तरकाखाड़ में हालात बेहद चिंताजनक हैं, जहां खुलेआम आदिवासियों की जमीन पर कब्जा किया जा रहा है सरकार हर साल आदिवासी विकास के नाम पर करोड़ों का बजट पेश करती है, योजनाओं की लंबी सूची गिनाई जाती है, लेकिन जमीनी हकीकत इससे बिल्कुल उलट है. विकास केवल कागजों तक सीमित है, जबकि असल जिंदगी में आदिवासी आज भी मूलभूत सुविधाओं और अपने अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे हैं.
वही पहाड़ी कोरवा समाज के लोगों ने बताया कि आज जो चार पीढियों से जो हमारे पूर्वजों के द्वारा जंगल में उपजाऊ लायक जमीन को बनाकर जीवन यापन कर रहे थे आज उसे जमीन को बाहरी व्यक्तियों एवं यादव समाज के लोगों के द्वारा गढ़वा धाम का कर छीना जा रहा है उच्च अधिकारियों द्वारा बोला जाता है कि उन लोगों से फैसला कर लो और आधे जमीन को बंटवारा भी कर लो तो वही आदिवासी समाज के लोगों ने कहा कि कर पीडिया से जो हमारे जमीन को पूर्वजों के द्वारा काबिज़कर कमाया जा रहा है उसे हम कैसे देंगे दूसरे व्यक्तियों को न तो वह हमारे समाज का लोग है तो हम उसे कैसे बंटवारा देंगे हम लोग नही देंगे और अगर हमारे लिए सरकार और शासन कोई पहल नहीं करती है तो क्या करेंगे जो अधिकारी हमारे फैसला में नहीं सनी करती हैआदिवासी समाज का अपना हक के लिए लड़ाई लडेगा..
सर्व आदिवासी समाज के जिला अध्यक्ष बसंत कुजूर का कहना है कि पहाड़ी कोरवा दशकों से इस क्षेत्र में बसे हुए हैं और अपनी मेहनत से जमीन को उपजाऊ बनाकर जीवन यापन कर रहे हैं. लेकिन अब बाहरी लोग उनकी जमीन पर जबरन कब्जा कर रहे हैं.यह सिर्फ एक गांव की समस्या नहीं, बल्कि पूरे जिले में पहाड़ी कोरवा समाज इसी पीड़ा से गुजर रहा है.
उन्होंने शासन-प्रशासन से अपील की है कि वर्षों से काबिज इन परिवारों को कानूनी दस्तावेज उपलब्ध कराए जाएं, उनके वन अधिकार पट्टे बनाए जाएं और भूमाफियाओं के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए. यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो यह राष्ट्रपति के उत्तर पुत्र कहे जाने वाले समाज अपनी जमीन और पहचान दोनों खो देगा.
आज जरूरत है कि आदिवासी समाज की इस पीड़ा को सिर्फ मंचों और घोषणाओं तक सीमित न रखा जाए, बल्कि जमीन पर उतरकर उनके अधिकारों की रक्षा की जाए. क्योंकि अगर उनकी जमीन ही उनसे छिन गई, तो उनके पास बचने के लिए कुछ भी नहीं रहेगा न पहचान, न भविष्य, और न ही जीने का सहारा, और ईनके रहते कोइ अप्रिय घटना घटती तो पुरी जिमेवारी शासन प्रशासन कि होगी..
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